*बदलता ट्रेंड-अब दिखाई नहीं देते सावन में झूले, गुम हो गए गीत मल्हार।*
लोगों की बदलती जीवन शैली में परंपराएं सिमट रही हैं।
बदांयू 27 जुलाई।
सावन में पेड की डालियों पर पड़ने वाले झूलों का अस्तित्व अब सिर्फ यादों में रह गया है। यही वजह है कि पहले और अब के सावन में जमीन-आसमान का अंतर है। सावन के झूले ग्रामीण इलाकों में भी नजर नहीं आते हैं। न ही कोई सावन का गीत व मल्हार गुनगनाता नजर आता है।
भारतीय संस्कृति के 12 महीनों में सावन एक खास महीना होता है। लेकिन, आधुनिक जीवन शैली के कारण यह सामान्य महीनों की तरह रह गया है। दो दशक पहले तक सावन को लेकर लोगों में गजब का उत्साह होता था। विशेष रूप से महिलाओं, युवतियाें व बच्चों में विशेष उत्साह देखने को मिलता था। सावन शुरू होते ही घरों के आंगन से बाग-बगीचों तक में बड़ा झूला देखने को मिलता था। झूले पर महिलाएं, युवतियां व बच्चे झूलते थे।
सावन के महीने से सामूहिकता का संदेश मिलता था। लेकिन, समय बदला। संयुक्त परिवारों का विघटन हुआ और एकल परिवारों की जीवनशैली आपाधापी वाली हो गई है। इसके कारण अब झूले नजर नहीं आते।
एक समय वह भी था, जब सावन शुरू होते ही झूले पड़ जाते थे। महिलाएं कजरी गाते हुए संयुक्त रूप से झूला झूलती थीं। लेकिन, अब वह सब खत्म हो गया है।
रस्सी वाले पुराने झूलों की जगह पर पेडस्टल (रेडीमेड झूला) ने जगह ले ली है। नगर से लेकर ग्रामीण इलाकों में साधन संपन्न लोगों के गार्डेन व छतों पर पेडस्टल देखे जा सकते हैं। लेकिन, इसमें सामूहिकता नहीं है। पेडस्टल परिवार के गिने-चुने सदस्यों तक ही सिमटा हुआ है।
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