आज के भारत में एक नया सामाजिक और आर्थिक प्रश्न हमारे सामने खड़ा है — क्या डिग्री ही सफलता की गारंटी है? इस सवाल का उत्तर हमें राजू कलाकार और डॉली चायवाला जैसे उदाहरणों में मिलता है। ये दोनों आम पेशों से जुड़े हुए लोग हैं, जिन्होंने अपनी कला, हुनर और स्मार्ट ब्रांडिंग के जरिए करोड़ों की कमाई कर ली है। वहीं दूसरी ओर लाखों युवा डिग्रियां लेकर भी बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं।
राजू कलाकार, जो सड़कों पर पत्थर बजाकर गाना गाता है, और डॉली चायवाला, जो अपने अनोखे अंदाज़ में चाय बेचता है, दोनों ने दिखा दिया कि अगर इंसान में कौशल, आत्मविश्वास और कुछ अलग करने की चाह हो, तो सफलता किसी कागज़ की डिग्री की मोहताज नहीं होती।
वहीं दूसरी ओर, हमारे समाज में आज भी डिग्री को प्रतिष्ठा और भविष्य की कुंजी माना जाता है। लेकिन जब पढ़े-लिखे युवाओं को ₹8,000–₹10,000 की नौकरी भी नहीं मिलती, तब यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हमारा शिक्षा तंत्र सिर्फ परीक्षा पास करने लायक बना रहा है, जीवन जीतने लायक नहीं?
समस्या यह नहीं कि डिग्री गलत है, बल्कि यह है कि डिग्री के साथ कौशल का अभाव है। शिक्षा से ज्यादा जरूरी है — व्यावहारिक ज्ञान, कम्युनिकेशन स्किल, मार्केटिंग समझ और आत्मनिर्भरता की भावना।
आज का समय बदल चुका है। इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने हुनर को ग्लोबल बना दिया है। अब “कौन हो?” से ज्यादा “क्या कर सकते हो?” मायने रखता है।
समाज को चाहिए कि वह हुनर को सम्मान दे, न कि केवल डिग्री को।
परिवारों को चाहिए कि बच्चों को डॉक्टर-इंजीनियर बनाने से पहले उनके अंदर के कलाकार, कारोबारी या क्रिएटर को पहचानें।
सरकार को चाहिए कि शिक्षा प्रणाली में कौशल और उद्यमिता को प्राथमिकता दे।
युवाओं को चाहिए कि डिग्री के साथ-साथ कुछ ऐसा सीखें, जो उन्हें किसी भी परिस्थिति में खड़ा कर सके।क्योंकि इस बदलते भारत में अब डिग्री नहीं, काबिलियत चलती है।
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