समाज दर्पण प्रदीप प्रजापति
विकलांग व्यक्तियों के अधिकारों और समानता की बात चाहे जितनी की जाए, मगर ज़मीनी सच्चाई आज भी इससे कोसों दूर है। समाज अब भी उन्हें “दया” की दृष्टि से देखता है, न कि एक स्वतंत्र और सक्षम नागरिक के रूप में। शारीरिक या मानसिक रूप से भिन्न व्यक्ति आज भी कई बार सामाजिक भेदभाव और उपेक्षा के शिकार हो रहे हैं।
सरकारी भवनों से लेकर स्कूलों तक नहीं दिखता समावेश
शहर के सरकारी दफ्तरों, स्कूलों और अस्पतालों में अब भी पर्याप्त रैंप, ब्रेल साइनेज, व्हीलचेयर सुविधा या सुलभ शौचालय जैसी बुनियादी ज़रूरतें नदारद हैं। कुछ जगहों पर संसाधन तो हैं, मगर उपयोग लायक स्थिति में नहीं। इससे साफ होता है कि कानून तो बन गए, पर अमल ढीला है।
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