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शहद चाहिए तो मधुमक्खी के छत्ते पर लात न मारें: प्रदीप प्रजापति

बदायूं, 13 जुलाई — समाज में बढ़ते हुए तनाव, टकराव और स्वार्थ के दौर में एक पुरानी कहावत एक बार फिर चर्चा में है – “अगर शहद इकट्ठा करना हो तो मधुमक्खी के चट्टे पर लात न मारे।” इस कहावत का गूढ़ अर्थ लोगों को शांति, समझदारी और सौहार्द के साथ रहने की सीख देता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आज के समय में रिश्तों को तोड़ने से अधिक जरूरी है उन्हें संभालना। चाहे पारिवारिक संबंध हों, सामाजिक तालमेल या फिर कार्यस्थल की भागदौड़—हर जगह मधुर व्यवहार और संयम की आवश्यकता है।

हाल ही में कई जगहों पर छोटे-छोटे विवादों के कारण बड़ी घटनाएं सामने आईं, जिससे यह सिद्ध होता है कि उत्तेजना और जल्दबाज़ी समाज में जहर घोल सकती है। वहीं दूसरी ओर, संवाद, धैर्य और सम्मान से बड़े से बड़ा संकट भी टल सकता है।

*समाजसेवियों और शिक्षकों ने अपील की है* कि लोगों को बच्चों से लेकर बड़ों तक यह समझाया जाए कि किसी से कुछ अच्छा पाने के लिए उसके साथ अच्छा व्यवहार भी जरूरी है। क्योंकि अगर आप मधुमक्खी को लात मारेंगे, तो शहद के बदले डंक ही मिलेगा।

समाज की मिठास बनाए रखने के लिए जरूरी है कि हम अपने स्वभाव में भी मिठास लाएं।

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