8:19 pm Friday , 31 July 2026
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समय की कमी या समझ की कमी? — आधुनिक जीवनशैली पर उठते सवाल : प्रदीप प्रजापति

समाज दर्पण प्रदीप प्रजापति

आज के दौर में समय नहीं है एक आम बहाना बन चुका है। हर उम्र, हर वर्ग का व्यक्ति समय की कमी की शिकायत करता नजर आता है। लेकिन क्या वाकई समय कम हो गया है या हमारी प्राथमिकताएँ बदल गई हैं?

विशेषज्ञों और समाजशास्त्रियों का मानना है कि आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में इंसान ने खुद को इतना उलझा लिया है कि वह जरूरी और गैर-जरूरी के बीच का फर्क ही भूल गया है। सोशल मीडिया, स्क्रीन टाइम, दिखावे की संस्कृति और बेतुकी प्रतिस्पर्धा ने जीवन के मूल उद्देश्यों को पीछे छोड़ दिया है।

जहाँ पहले एक परिवार साथ बैठकर दिन का हालचाल साझा करता था, वहीं आज हर कोई मोबाइल स्क्रीन में गुम है। न खुद के लिए समय है, न अपनों के लिए।

समाज के जागरूक नागरिकों का कहना है कि समय की कमी असल में अनुशासन और सही दिशा की कमी है। अगर व्यक्ति अपने दिनचर्या में से मात्र एक घंटा भी आत्मचिंतन, परिवार और स्वास्थ्य को दे, तो समय की कमी की यह धारणा स्वतः समाप्त हो सकती है।

अब सवाल यह है कि क्या हम वाकई व्यस्त हैं या हमने खुद को व्यस्त समझ लिया है?
समय की नहीं, सोच की ज़रूरत है।

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