वृद्ध माता-पिता की देखभाल अब बच्चों को बोझ क्यों लगने लगी है?।
समाज दर्पण: प्रदीप प्रजापति
समय बदला है, समाज की संरचना बदली है, और जीवन की रफ्तार भी पहले से कई गुना तेज़ हो गई है। इन्हीं बदलावों के बीच एक दुखद सच्चाई यह भी है कि आज के समय में वृद्ध माता-पिता की देखभाल कई लोगों को बोझ सी लगने लगी है। यह सवाल न सिर्फ सामाजिक रूप से गंभीर है, बल्कि नैतिकता और मानवीय रिश्तों के स्तर पर भी सोचने पर मजबूर करता है।
पहले संयुक्त परिवार की परंपरा थी, जहां दादा-दादी, माता-पिता, बच्चे — सभी एक ही छत के नीचे रहते थे। बुज़ुर्गों का सम्मान होता था, उनका अनुभव परिवार की संपत्ति माना जाता था। लेकिन अब एकल परिवारों की अवधारणा बढ़ी है, जिसमें जगह तो है पर ‘समय’ और ‘संवेदना’ की भारी कमी है।
नौकरी की व्यस्तता, बढ़ती प्रतिस्पर्धा, और निजी ज़िंदगी के तनावों के बीच लोग अपने माता-पिता को प्राथमिकता देने में चूक जाते हैं।
आर्थिक कारण भी इस सोच को बढ़ावा देते हैं। आज की पीढ़ी पर खुद की ज़रूरतों और बच्चों की परवरिश का इतना बोझ है कि उन्हें माता-पिता की देखभाल अतिरिक्त जिम्मेदारी लगती है। कई बार तो लोग वृद्ध माता-पिता को वृद्धाश्रम भेज देना बेहतर विकल्प मान लेते हैं।
इसके अलावा, डिजिटल युग में संबंधों की गर्माहट कम हो गई है। जहां पहले समय बिताना, बात करना, साथ खाना— ये सभी एक परिवार की मजबूती के प्रतीक थे, अब वही चीजें मोबाइल, टीवी और सोशल मीडिया के शोर में गुम हो गई हैं। संवाद की कमी और दूरी ने भी वृद्ध जनों को ‘अलग-थलग’ कर दिया है।
दूसरी ओर, कुछ युवा यह सोचते हैं कि उन्होंने जो कुछ पाया है, वह अपनी मेहनत से पाया है — इसलिए उन्हें किसी के प्रति उत्तरदायित्व महसूस नहीं होता। यह सोच भी बुज़ुर्गों की उपेक्षा को जन्म देती है।
लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि आज जो हम हैं, उसमें हमारे माता-पिता का त्याग, परिश्रम और प्रेम शामिल है। जिन हाथों ने हमें चलना सिखाया, आज उन्हीं को सहारा देने में हमें संकोच क्यों? यह सिर्फ सामाजिक नहीं, आत्मिक सवाल भी है।
समाज को इस दिशा में जागरूक होने की ज़रूरत है। स्कूलों, मीडिया, सामाजिक संगठनों और सरकार को भी बुज़ुर्गों के सम्मान और देखभाल को एक संस्कार के रूप में प्रस्तुत करना होगा। क्योंकि जब एक पीढ़ी अपने वृद्धों को बोझ समझेगी, तो अगली पीढ़ी उसे भी वही व्यवहार लौटाएगी।
इसलिए ज़रूरत है संवेदना, समय और संस्कार की — ताकि वृद्ध माता-पिता फिर से सम्मानित जीवन जी सकें, और समाज अपनी जड़ों से न कटे।
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