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बदांयू में बैंक से कर्ज मिलना आसान नहीं, बिना कर्ज के जिंदगी चलती नही

बदायूं 24 जनवरी। बैंक से लोन लेने के लिए दो माह तक चक्कर लगाया। कभी ये कागज तो कभी वो कागज का बहाना बनाकर टरकाते रहे। जरूरत थी, तो गांव के एक व्यक्ति (सूदखोर) से ब्याज पर कर्ज ले लिया। अधिकतर किसानों की इसी तरह की शिकायत रहती है। हालांकि बैंकों के अधिकारियों का कहना होता है कि लोन की एक प्रक्रिया है। उसे पूरा करने के बाद ही ऋण दिया जाता है।

जानकार बताते हैं कि किसानों को बैंकों से आसानी से कर्ज नहीं मिल पाता है। इसकी वजह किसानों के आर्थिक हालात ही होते हैं। ज्यादातर किसान बैंक के नियम और शर्तों को पूरा नहीं कर पाते हैं। इसके बावजूद उन्हें जीवन तो जीना होता है। ऐसे में उनके सामने दो विकल्प होते हैं, या तो वे मजदूरी करने के लिए दूसरे शहर चले जाएं। अथवा साहूकार से महंगे ब्याज पर कर्ज लेकर जीवन जीने की जद्दोजहद करें। कुछ किसान गांव से किसी शहर रोजगार की तलाश में चले जाते हैं, कुछ गांव में ही कर्ज लेकर खेती में भविष्य के सपने बोने लगते हैं। इन पर जब मौसम की मार पड़ती है तो सही नहीं जाती है।

किसान कहते हैं कि बैंकों से लिया गया कर्ज सबसे अधिक किसान ही चुकाते हैं। वह कहते हैं कि किसानों की कई तरह की समस्या होती है। चूंकि कृषि मौसम पर आधारित है। कम या ज्यादा बारिश होने पर अक्सर फसलें खराब हो जाती हैं। ऐसा होते ही किसानों को भारी नुकसान हो जाता है। इसके बाद कर्ज लेकर बच्चों की पढ़ाई से लेकर शादी तक करनी पड़ती है। इन सब के लिए बैंक से कर्ज नहीं मिलता है। ऐसे कर्ज के लिए उन्हें साहूकार के पास जाना पड़ता है, जो कइयों के लिए जानलेवा साबित हो जाता है। यही नहीं, बंटाई पर खेती करने वाले किसानों को बैंकों से आसानी से कर्ज नहीं मिल पाता है। चूंकि जमीन उनके नाम पर नहीं होती है इसलिए कर्ज देने में आनाकानी की जाती है।

आरबीआई की साल 2019 की रिपोर्ट में नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट्स ऑल इंडिया रुरल फाइनेंशियल इन्क्लूजन सर्वे 2016-2017 के हवाले से बताया गया था कि उचित कानूनी फ्रेमवर्क और कृषि संबंधी दस्तावेज की अनुपलब्धता के चलते बटाईदार किसान, साझा किसान, मौखिक लीज वाले किसान व भूमिहीन श्रमिक किसान संस्थागत कृषि ऋण हासिल करने में बेहद मुश्किलों का सामना करते हैं। इससे जिले के 75 हजार उन किसानों की हालत का अंदाजा लगा सकते हैं, जोकि बंटाई पर खेती करते हैं। मौसम की मार ऐसे ही किसानों पर अधिक पड़ती है। एक बार भी फसल खराब हुई तो इनकी कमर टूट जाती है। जिले में बंटाई पर खेती करने वाले किसानों की संख्या तकरीबन 75 हजार है, जोकि कुल किसानों की लगभग आधी है।

किसानों को आसानी से बैंकों से लोन मिल जाए इसलिए सरकार ने किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) को पीएम सम्मान निधि से जोड़ दिया। सरकार का कहना है कि जिन किसानों को पीएम किसान सम्मान निधि मिल रही है, उनका केसीसी बनाया ही जाएगा। इसके बावजूद जिले के करीब 80 हजार किसानों का केसीसी बना है। बैंक के अधिकारी कहते हैं कि केसीसी के कुछ मानक हैं। उन्हें पूरा करने पर ही इसे बनाया जाता है।————*****—- संपादक सुशील धींगडा।

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