1:10 am Saturday , 18 July 2026
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ठहर गया है वक्त- NEHA MEHTA

NEHA MEHTA

ठहर गया है वक्त अब,
ठहरने की कोई वजह भी नहीं,
तेरी तस्वीर के सिवा,
मेरी नज़रों में कोई सुबह भी नहीं।
तू ही मेरा मुक़म्मल सफ़र,
तू ही मेरी मंज़िल का पता,
मुसाफ़िर हूँ मैं उसी राह की,
जहाँ कोई दूसरा रास्ता भी नहीं।
बदलाव तो फितरत है जमाने की,
ये मैं बखूबी समझती हूँ,
मगर दिल के इस शहर में,
अब कोई तीसरा दरवाज़ा भी नहीं।
मेरे वजूद की नींव में,
सिर्फ तेरा ही ज़िक्र शामिल है,
इस इमारत को ढहाकर,
बनाने का अब इरादा भी नहीं।
मेरे इश्क़ का निचोड़ है,
या ये तेरी चाहत की बंदगी,
तू साथ हो तो मुकम्मल,
तू नहीं तो कोई तमाशा भी नहीं।
जनाज़ा तो निकल चुका है,
अब क्या कांधे बदलना,
ये रूह अब तेरी अमानत है,
इसे किसी और का वास्ता भी नहीं।

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