Kaveri Gupta
तेरी चाहत में कुछ ऐसी उलझन है
न कहते बनता है, न सहते बनता है।
तू सामने हो तो साँस थम जाती है
तू दूर हो तो दिल रहता नहीं।
ये कैसा इश्क़ है, ये कैसी बेचैनी
हर लम्हा बस तेरा ही गुमान है।
सुलझाऊँ तो डोर टूटती है चाहत की,
उलझा रहूँ तो सुकून का सामान है।।
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