ट्रांसफर नीति ठंडे बस्ते में, बदायूं के सीएचसी बदहाल; सहसवान-दंहगबा समेत कई केंद्रों पर वर्षों से जमे चिकित्साधीक्षक
स्वास्थ्य सेवाएं चरमराईं, मरीजों को निजी अस्पतालों की शरण
बदायूं, जागरण मोर्चा। जिले की सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की हालत खस्ता है। शासन की ट्रांसफर नीति यहां फाइलों में दबी पड़ी है। वजीरगंज, दातागंज, समरेर, बिनावर, ककराला, सहसवान और दंहगबा समेत ज्यादातर सीएचसी पर चिकित्साधीक्षक और कर्मचारी पांच-पांच साल से एक ही कुर्सी पर जमे हैं। नतीजा, स्वास्थ्य सेवाएं पटरी से उतर गई हैं।
2025 की नीति भी बेअसर
शासनादेश साफ था: तीन साल से अधिक समय से एक जगह तैनात अधिकारियों-कर्मचारियों का ट्रांसफर अनिवार्य है। मकसद था व्यवस्था में पारदर्शिता और कार्यक्षमता लाना। लेकिन बदायूं में इस आदेश को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। लंबे समय से एक ही जगह तैनाती के कारण कई केंद्रों पर मनमानी चरम पर है।
मरीज बेहाल, जेब पर भार
स्थानीय लोगों का दर्द है कि सीएचसी पर डॉक्टरों की भारी कमी है। दवाएं नहीं मिलतीं। पूरी व्यवस्था अव्यवस्थित है। आलम यह है कि मरीजों को प्राथमिक उपचार के लिए भी दर-दर भटकना पड़ रहा है। मजबूरी में निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है, जिससे गरीब मरीजों पर आर्थिक बोझ कई गुना बढ़ गया है।
नए सीएमओ से जगी उम्मीद
हाल ही में जिले में आए नए मुख्य चिकित्सा अधिकारी विकास शर्मा ने इस पर सख्त रुख दिखाया है। उन्होंने कहा, “शासनादेश के अनुसार ट्रांसफर नीति लागू की जाएगी। तीन साल से अधिक जमे हुए अधिकारियों व कर्मचारियों को स्थानांतरित किया जाएगा। किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।”
सीएमओ के इस बयान के बाद लोगों में उम्मीद जगी है। जनता को भरोसा है कि अब शासनादेश का पालन होगा और सालों से एक ही जगह जमे अधिकारियों का ट्रांसफर कर व्यवस्था सुधारी जाएगी।
सवाल अब भी कायम
बड़ा सवाल यही है कि क्या स्वास्थ्य विभाग इस गंभीर मुद्दे को प्राथमिकता देगा? क्या ट्रांसफर नीति वाकई जमीन पर उतरकर सीएचसी की बदहाल सेवाओं में सुधार लाएगी, या फिर यह भी दूसरी योजनाओं की तरह सिर्फ कागजों तक सिमट कर रह जाएगी? जिले की निगाहें अब सीएमओ की कार्रवाई पर टिकी हैं।
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