बरेली कैंट। रानी लक्ष्मीबाई की जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय मानव सेवा संस्थान ट्रस्ट (रजि.) भारत द्वारा वीरांगना चौक स्थित उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की गई। संस्थान की राष्ट्रीय अध्यक्ष बिंदु इशिका सिंघानिया ने बताया कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में हुआ था। बचपन से ही वे घुड़सवारी, कमानबाजी और तलवार चलाने में निपुण थीं।
उन्होंने कहा कि रूढ़िवादी समाज में रहते हुए भी रानी लक्ष्मीबाई ने वह साहस दिखाया, जिसकी कल्पना उस समय महिलाओं से नहीं की जाती थी। उन्होंने तमाम सामाजिक बंधनों और अन्याय का सामना करते हुए स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य बनाया। अंग्रेजों द्वारा झांसी हड़पने के प्रयास पर उनका दृढ़ निश्चय— “मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी”—आज भी महिलाओं के लिए प्रेरणा है।
राष्ट्रीय महामंत्री नरेंद्र पाल ने कहा कि रानी लक्ष्मीबाई ने युद्ध के दौरान अपने दत्तक पुत्र को पीठ पर बांधकर लड़ाई लड़ी और यह साबित कर दिया कि मातृत्व किसी भी जिम्मेदारी या साहस में बाधा नहीं बल्कि शक्ति का स्रोत है।
राष्ट्रीय वरिष्ठ उपाध्यक्ष पवन निहालानी ने कहा कि रानी लक्ष्मीबाई जन्म से राजकुमारी नहीं थीं, लेकिन उन्होंने हर परिस्थिति का सामना करने के लिए स्वयं को तैयार किया। उनका जीवन संदेश देता है कि महिलाएं अपने कौशल, आत्मविश्वास और दृढ़ इच्छाशक्ति से किसी भी चुनौती को पार कर सकती हैं।
कार्यक्रम में राष्ट्रीय अध्यक्ष बिंदु इशिका सिंघानिया, राष्ट्रीय महामंत्री नरेंद्र पाल, राष्ट्रीय वरिष्ठ उपाध्यक्ष पवन निहालानी, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुकेश मेहंदीरत्ता, राकेश कुमार मौर्य, संरक्षक भारतेंदु सिंह, जे.आर. गुप्ता, डॉ. अखिलेश गुप्ता, दामोदर सिंह, भीकम सिंह, रामकिशोर, आर्यन सिंह, शैलेंद्र सिंह, पायल राठौर, रेशमा सहित संस्थान के अन्य सदस्य उपस्थित रहे।
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