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बदांयू 11 सितंबर।
पितृ पक्ष में श्रद्धालु अपने पूर्वजों की आत्मशांति के लिए तर्पण और पिंडदान करने में जुट गए हैं। बुधवार को मंदिरों, पवित्र स्थलों और घरों में लोगों ने तिलांजलि अर्पित कर अपने पितरों को स्मरण किया। यह धार्मिक प्रक्रिया पूरे पखवाड़े तक चलेगी।
पितृ पक्ष में लोग अपने स्वर्गवासी माता-पिता, दादा-दादी और पूर्वजों के नाम से प्रतिदिन भोजन निकालकर उसे गाय, कौवों और कुत्तों को खिला रहे हैं। श्रद्धालुओं ने बताया कि वे पूड़ी-सब्जी और खीर बनाकर हवन में आहुति दे रहे हैं, ताकि अग्निदेव के माध्यम से पितरों तक भोग पहुंचे। परंपरा के अनुसार पितृ पक्ष के अंतिम दिन गुड़, घी, पूड़ी-खीर और पूड़ी-सब्जी की विशेष आहुति दी जाएगी और पितरों से स्वर्गलोक की प्राप्ति की कामना की जाएगी। पितृ पक्ष के तीसरे दिन बुधवार को भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु घाटों और मंदिरों पर पिंडदान करते नजर आए।
कई लोगों ने घर पर ही तिल-जल अर्पित कर तर्पण किया। आचार्य राजेश शर्मा ने बताया कि सनातन धर्म में तीन प्रमुख ऋण बताए गए हैं। पितृ, देव और ऋषि ऋण। इनमें पितृ ऋण को चुकाने के लिए पितृ पक्ष में श्राद्धकर्म किया जाता है।
उनका कहना है कि तिल-जल और पिंडदान के प्रभाव से पूर्वजों को बैकुंठ की प्राप्ति होती है। श्रद्धालु रामदेव ने कहा कि माता-पिता और बुजुर्ग जीवित तीर्थ होते हैं। उनका सम्मान, सेवा और प्रेम से देखभाल करना ही सबसे बड़ा धर्म है। उन्होंने बताया कि पितृ पक्ष केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि परिवार और परंपराओं को जोड़ने का अवसर है। गांव और शहर दोनों जगह सुबह से ही लोग अनुष्ठान में व्यस्त रहते हैं। हवन, तर्पण और पिंडदान के बाद परिजन एकत्र होकर पूर्वजों को याद कर ब्राह्मण भोज कराने के बाद अपने परिवार के सदस्यों संग प्रसाद रुपी भोग को करते हैं।
प्रदीप प्रजापति
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