समाज दर्पण : प्रदीप प्रजापति
घरेलू हिंसा: घर की चारदीवारी में दम तोड़ती असंख्य आवाज़ें
घरेलू हिंसा केवल एक निजी मामला नहीं, बल्कि सामाजिक बीमारी बन चुकी है। यह शारीरिक चोटों तक सीमित नहीं, बल्कि मानसिक, भावनात्मक और आर्थिक शोषण का भी गहरा जाल है। हर दिन देश में हजारों महिलाएं, बच्चे और कभी-कभी पुरुष भी अपने ही घर में हिंसा का शिकार होते हैं, लेकिन समाज की “इज्जत” और “परिवार की मर्यादा” के नाम पर चुप्पी साध लेते हैं।
यह चुप्पी सिर्फ पीड़ित की नहीं होती, बल्कि पूरे समाज की सहमति बन जाती है। अब वक्त है कि इन चारदीवारियों के भीतर की आवाज़ें बाहर आएं और समाज उन्हें सुने — समझे — और जवाबदेह बने।
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