90 के दशक का बचपन: जहां धूप, धूल और दोस्ती थी — आज बस मोबाइल और टीवी स्क्रीन की रोशनी है
जब बचपन में धूप, धूल और दोस्ती होती थी — अब बस स्क्रीन की रोशनी बची है
समाज दर्पण: प्रदीप प्रजापति
90 का दशक सिर्फ एक समय नहीं था, वह एक एहसास था — सादगी में सुकून ढूँढ लेने का, मिट्टी में खेलकर बड़े होने का, और दोस्ती में दुनिया बसा लेने का। तब के बच्चे धूप में पसीने से तर हो जाते थे, मगर चेहरे पर मुस्कान की ठंडी छाया बनी रहती थी। गली के कोनों में क्रिकेट, पतंगबाज़ी और लुका-छिपी का शोर होता था, न कि ऑनलाइन गेम्स की खामोशी।
तब की गर्मियों में बिजली चली जाती थी, तो छतों पर सोते हुए तारे गिनने का मज़ा था। स्कूल से लौटकर टीवी पर ‘शक्तिमान’ देखने की होड़ और रविवार की सुबह ‘महाभारत’ या ‘रामायण’ का इंतजार एक त्यौहार जैसा होता था। बच्चे एक-दूसरे के घर बिना कॉल किए पहुंच जाते थे, क्योंकि रिश्तों के लिए नोटिफिकेशन की ज़रूरत नहीं होती थी।
किताबों के पन्नों के बीच छुपे थे पेंसिल गेम, और जेब में होते थे कंचे, चूरन, और दोस्ती के वादे। न ब्रांड की पहचान थी, न ही दिखावे की ज़रूरत। कम था, मगर जो था उसमें अपनापन था, हँसी थी, और सबसे ज़्यादा — *समय* था।
आज जब बच्चे मोबाइल, टैब और टीवी स्क्रीन में उलझे हैं, तब 90 के दशक के बचपन की यादें एक सुनहरी धूप की तरह चमकती हैं। तब धूल में खेलना बीमारी नहीं, सेहत का हिस्सा था। और दोस्ती — वो सिर्फ ऑनलाइन ‘फ्रेंड रिक्वेस्ट’ नहीं, असल में साथ बैठकर खिलखिलाने का नाम था।
वो दौर चला गया… पर उस दौर के बच्चे आज भी दिल से बच्चे हैं।
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