Sushila kajla आज फिर उसी पेड़ के नीचे बैठकर रात को देखा मैंने, खामोशियों में छुपे कई अनकहे जज़्बातों को महसूस किया मैंने। तब समझ आया कि सुकून शोर में नहीं मिलता दोस्तों, वो तो चाँदनी रात, ठंडी हवा और किसी पेड़ की छांव में मिलता है।