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हीरे यूँ ही नहीं मिलते

हीरे यूँ ही नहीं मिलते

(सम-सामयिक चिंतन कथा)

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कुछ दिन पहले एक युवक की गिरफ्तारी की खबर आई।
परिवार प्रतिष्ठित था। घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। अच्छी शिक्षा मिली थी, संसाधन मिले थे, अवसर मिले थे। लेकिन वह नकली उत्पाद बनाने और बेचने के आरोप में पकड़ा गया।
सबसे अधिक दुखद बात गिरफ्तारी नहीं थी।
दुख तब हुआ जब उसके समर्थन में कुछ लोग खड़े हो गए।
किसी ने कहा— “आज के जमाने में ईमानदारी से काम करना आसान नहीं है।”
किसी ने कहा— “समाज अपने लोगों का साथ नहीं देता, इसलिए युवाओं को ऐसे रास्ते चुनने पड़ते हैं।”
और कुछ लोग तो उसे लगभग पीड़ित साबित करने में जुट गए।
मैं सोचने लगा…
क्या सचमुच सफलता का कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था?

उसी शाम मुझे बास्केटबॉल के महान खिलाड़ी माइकल जॉर्डन का एक पुराना साक्षात्कार याद आ गया।
उन्होंने कहा था—
“मैं अपने जीवन में 9000 से अधिक शॉट मिस कर चुका हूँ। लगभग 300 मैच हार चुका हूँ। 26 बार मुझे मैच जिताने वाला अंतिम शॉट लगाने का अवसर मिला और मैं असफल रहा। मैं बार-बार असफल हुआ हूँ, इसलिए सफल हुआ हूँ।”
यही तो फर्क है।
एक व्यक्ति असफलताओं को सीढ़ी बनाता है।
दूसरा व्यक्ति शॉर्टकट को मंज़िल समझ लेता है।
एक संघर्ष करता है।
दूसरा बहाना ढूँढ़ता है।

हमारे गाँवों में पहले अधिकांश घर घास-फूस के हुआ करते थे।
अब यदि कोई कह दे की यह मेरा घर है, मे इसमे आग लगाऊंगा? तो कोई उसे आग लगाने देगा??
नहीं, क्यूंकि यदि किसी एक घर में आग लग जाए तो पूरा मोहल्ला जल सकता है।कुछ ही देर में वह पूरे गाँव को अपनी चपेट में ले लेती है।
गलत काम भी ऐसी ही आग है।
जब कोई व्यक्ति नकली उत्पाद बेचता है, धोखाधड़ी करता है या अनैतिक रास्ता अपनाता है, तब वह केवल अपनी साख नहीं जलाता।
वह पूरे समाज की विश्वसनीयता पर कालिख पोतता है।
उसकी एक गलती हजारों ईमानदार लोगों की मेहनत पर प्रश्नचिह्न लगा देती है।
इसलिए ऐसे समय में मौन रहना भी अपराध है।
गलत को गलत कहना ही समाज के प्रति हमारी जिम्मेदारी है।

लेकिन कहानी का दूसरा पक्ष भी है।
युवा आखिर गलत रास्तों की ओर क्यों आकर्षित हो रहे हैं?
क्योंकि आज का दौर परिणामों का महिमामंडन करता है, प्रक्रियाओं का नहीं।
लोग सफलता देखते हैं, संघर्ष नहीं।
लोग हीरा देखते हैं, उसकी खुदाई नहीं।
हर युवा बड़ी कार चाहता है।
बड़ा घर चाहता है।
पहचान चाहता है।
सम्मान चाहता है।
लेकिन बहुत कम लोग उस तपस्या के लिए तैयार हैं जो इन सबकी कीमत होती है।
सच्चाई यह है कि हीरे धरती की सतह पर नहीं मिलते।
उनके लिए गहराई में उतरना पड़ता है।
अंधेरे में जाना पड़ता है।
हथौड़े चलाने पड़ते हैं।
पसीना बहाना पड़ता है।
और कई बार वर्षों तक खाली हाथ लौटना पड़ता है।
मित्रों,
जीवन में यदि कुछ बड़ा हासिल करना है तो तितलियों का पीछा मत कीजिए।
तितलियाँ आकर्षक होती हैं, लेकिन ठहरती नहीं।
आज यहाँ, कल वहाँ।
उनके पीछे भागते-भागते आदमी थक जाता है।
लेकिन हीरे…
हीरे धैर्य मांगते हैं।
अनुशासन मांगते हैं।
चरित्र मांगते हैं।
और सबसे बढ़कर— लगातार प्रयास मांगते हैं।
याद रखिए—
भाव कम करके बाजार में प्रवेश मिल सकता है, सम्मान नहीं।
नकली माल बेचकर पैसा मिल सकता है, प्रतिष्ठा नहीं।
शॉर्टकट से लाभ मिल सकता है, स्थायित्व नहीं।
यदि दौड़ शुरू की है तो मैदान मत छोड़िए।
यदि लक्ष्य चुना है तो रास्ता मत बदलिए।
यदि असफल हुए हैं तो फिर से प्रयास कीजिए।
क्योंकि दुनिया में जितने भी असली हीरे हैं, वे किसी भाग्यशाली व्यक्ति को यूँ ही नहीं मिले।
किसी ने वर्षों तक धरती की छाती चीरकर उन्हें खोजा है।
और जीवन का नियम भी यही है—
हीरे यूँ ही नहीं मिलते।
उन्हें पाने के लिए खुदाई करनी पड़ती है।

गूगल से साभार

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