साइकिल के वे दो पहिए, जो थाम लेते हैं ज़िंदगी की डोर।
बदांयू 3 जून।
> _रफ़्तार के इस दौर में, ज़रा ठहर के देख,
> दो पहियों पर ज़िंदगी, कितनी हसीन है देख।_
उगते सूरज की पहली किरण जब धरती का माथा चूमती है, उसी क्षण क्षितिज पर एक साया उभरता है — साइकिल पर सवार एक इंसान। न इंजन का शोर, न धुएँ का गुबार। बस दो पहियों की खामोश ताल और पेडल पर रखे कदमों का संगीत। आज, 3 जून, विश्व साइकिल दिवस पर यह दृश्य केवल एक तस्वीर नहीं, एक दर्शन है।
संयुक्त राष्ट्र ने 2018 में इस दिन को कैलेंडर पर दर्ज किया, पर साइकिल का रिश्ता तो आदमी के संघर्ष और सादगी से सदियों पुराना है। गांधी के आश्रम से लेकर प्रेमचंद के होरी के गाँव तक, साइकिल हमेशा आम आदमी के आत्मसम्मान का वाहन रही है।
> _साइकिल वो सवारी है, जो राजा और रंक को एक कर दे,
> न पेट्रोल का मोहताज, न ज़माने की परवाह करे।_
आधुनिकता ने हमें गाड़ियों की तेज़ रफ्तार तो दे दी, मगर छीन ली हमारे शरीर की लय। एसी कमरों में बैठे-बैठे हम मोटापे, अनिद्रा और थकान के गुलाम बन गए। साइकिल यहाँ एक वैद्य बनकर आती है। इसके हर चक्कर के साथ धमनियों में रुका हुआ खून फिर बहने लगता है। पसीने की हर बूंद शरीर से आलस्य का विष निकाल देती है।
> _पेडल मारते रहो, गर ज़िंदगी से प्यार है,
> सेहत भी मिलेगी, और बचेगा घर का उधार है।_
विज्ञान कहता है कि रोज़ आधा घंटा साइकिल चलाना हृदय को 10 साल जवां रखता है। पर साहित्य कहता है — ये वो तप है जो मन को भी निर्मल कर देता है।
जब एक साइकिल सड़क पर चलती है, तो धरती थोड़ा और खुलकर साँस लेती है। न पेट्रोल की गंध, न हॉर्न की चीत्कार। साइकिल का पहिया केवल सड़क पर नहीं, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य पर भी निशान छोड़ता है — कार्बन का नहीं, करुणा का।
> _धुआँ उगलती गाड़ियों से, आसमां भी रोया है,
> चलो साइकिल की डगर, इस धरा ने टोका है।_
विडंबना यह है कि जिस साइकिल ने मुल्क को डाकिया दिया, दूधवाला दिया, अखबार वाला दिया — उसी के लिए आज सड़कों पर जगह नहीं बची। चौड़ी सड़कें कारों के लिए हैं, और साइकिल सवार हाशिये पर धकेल दिया गया है। ज़रूरत है कि हम विकास की परिभाषा में फिर से सादगी को जगह दें।
इस विश्व साइकिल दिवस पर एक बार फिर पेडल पर पाँव रखें। महसूस करें कि कैसे हवा आपके चेहरे की हर शिकन को खोल देती है। याद करें बचपन की वो पहली साइकिल, जिस पर बैठकर आपको पहली बार उड़ने का अहसास हुआ था।
> _बचपन की वो साइकिल, पहली उड़ान थी मेरी,
> गिर कर संभलना भी, उसने सिखाई ज़िंदगी पूरी।_
साइकिल सिर्फ लोहा और रबर नहीं है। यह एक विचार है — धीमे चलने का, खुद से मिलने का, और धरती को थोड़ा कम दुख देने का। आइए, इन दो पहियों से फिर से ज़िंदगी की डोर थाम लें।
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> _तेज़ी ज़िंदगी नहीं होती, ज़िंदगी हर साँस में होती है।
> और साइकिल हमें हर साँस का हिसाब रखना सिखाती है।

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