5:35 pm Wednesday , 29 July 2026
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अंधेरे को अंधेरा – Ravina Mishra

Ravina Mishra

सुनो,
मत कहना
अंधेरे को अंधेरा
दिख रही जो चीज
वह असली नहीं है,
जो लगे नकली
वही नकली नहीं है
नाचता है
बीन बनकर सपेरा
मौन ऋतुओं की
शिराओं में सनसनी है
आंख चुंधियाती जहाँ पर
रौशनी है
हो रहा है
फसल पर हावी लुटेरा
कई हिस्सों में
हमारे घर बंटें हैं
उड़ रहे वनपांखियों के पर कटे हैं।

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