Jaya
Jaya__Kishori__
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हम जो शब्द बोलते हैं वे शब्द तो केवल अंतिम अभिव्यक्ति होते हैं। उनका जन्म पहले विचारों में होता है, और विचारों का जन्म हमारी भावनाओं में।
यदि भीतर क्रोध, ईर्ष्या, अहंकार, भय या स्वार्थ भरा है, तो चाहे हम कितने भी मीठे शब्द बोलें, उन शब्दों में सच्चाई और शांति नहीं होगी। हमारी वाणी कहीं न कहीं वही अशुद्धता प्रकट कर देगी
लेकिन यदि भीतर की भावना पवित्र हो — जैसे करुणा, शुभभावना, प्रेम, सम्मान और सच्चाई — तो विचार स्वतः सुंदर बनेंगे और वाणी में मधुरता आ जाएगी
इसलिए केवल बोलने का तरीका बदलना पर्याप्त नहीं है
पहले अपनी भावनाओं को देखना आवश्यक है —
मैं किसी के लिए क्या महसूस करता हूँ
मेरे भीतर कौन-सी ऊर्जा चल रही है
क्योंकि भावना बीज है, विचार उसका पौधा है, और वाणी उसका फल
जब भावना शुद्ध होती है, तब विचार सकारात्मक और स्पष्ट होते हैं
और जब विचार शुद्ध होते हैं, तब वाणी ऐसी बनती है जो किसी को चोट नहीं पहुँचाती, बल्कि शांति, प्रेरणा और विश्वास देती है
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