उझानी में ‘डिग्री नहीं, सेटिंग’ से चल रहे अस्पताल: नऐ साहब, ऑपरेशन कीजिए!
उझानी बदायूँ 10 मई।
उझानी की गलियों में ‘अस्पताल’ शब्द का मतलब बदल गया है। यहां बोर्ड पर MBBS लिखा है, अंदर कंपाउंडर इंजेक्शन ठोक रहा है। ’24 घंटे इमरजेंसी’ का दावा है, पर रात में ताला लटका मिलता है। अब सीएचसी के नऐ चिकित्सा अधीक्षक आए हैं तो पूरा कस्बा टकटकी लगाए बैठा है कि ‘सफाई अभियान’ कब शुरू होगा?
पिछले साल फरवरी में उझानी में खूब हंगामा हुआ था। नगर निवासी अरविंद कुमार की शिकायत पर पहले एसीएमओ रहे,अब प्रभारी सीएमओ डॉ. मोहन झा टीम लेकर ‘ हॉस्पिटल’ पहुंचे थे। ओटी का ताला खुलवाया तो अंदर रजिस्ट्रेशन के नाम पर सन्नाटा। कागज मांगे तो स्टाफ एक-दूसरे का मुंह ताकने लगा। साहब ने मौके पर ही ऑपरेशन थिएटर सील कर दी और नोटिस थमा दिया। इसी तरह एक दूसरे नर्सिंग होम में महिला की मौत के बाद सील कर दिया, संचालक ने खुद सील तोड दी, कार्रवाई फिर सील लगा दी, कुछ दिन बाद फिर से चलने लगा।
पर स्थानीय लोगों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया –
“साहब, सील लगने के 15 दिन बाद ही पर्दे के पीछे फिर से ‘कट-पिट’ शुरू हो गई। मरीज को बोला जाता है कि ऊपर वाले कमरे में मशीन खराब है, नीचे वाले में इलाज चल रहा है।”
डॉक्टर गायब, बोर्ड लाजवाब उझानी बाईपास,पर 3 ऐसे ‘हॉस्पिटल’ हैं जहां डॉक्टर हफ्ते में सिर्फ रविवार को 2 घंटे के लिए दर्शन देते हैं। बाकी दिन अप्रशिक्षित स्टाफ ही ‘भगवान’ बना बैठा है।
नगर में बिना पैथोलॉजिस्ट के ही खून-पेशाब की रिपोर्ट पर ठप्पा लग रहा है। एक मेडिकल स्टोर वाले ने दबी जुबान में कहा, “100 रुपये दो, प्लेटलेट्स जितनी चाहो लिखवा लो।”
डिलीवरी का रेट कार्ड-
नॉर्मल डिलीवरी 5000, ऑपरेशन 15000। पैसा दो, वरना रेफर का डर दिखाकर जेब ढीली कराओ। पिछले साल एक केस में जच्चा-बच्चा की हालत बिगड़ी तो हंगामा हुआ, फिर सब शांत।
रजिस्ट्रेशन का झोल- उझानी में कितने अस्पताल वैध हैं, इसका रिकॉर्ड ही स्वास्थ्य विभाग के पास साफ नहीं। आरोप है कि कई संचालक दूसरे के नाम पर लाइसेंस लेकर धंधा कर रहे हैं।
ऊपर तक’ पहुंच का फायदा नाम न छापने की शर्त पर एक कर्मचारी ने बताया, “छापा पड़ने से पहले ही फोन आ जाता है। फाइल दबाने के रेट फिक्स हैं।”
जनता का भरोसा जीतना जरूरी गरीब आदमी जाए तो कहां जाए? सरकारी अस्पताल में भीड़, प्राइवेट में लूट। लोग कहते हैं, “साहब अगर 4 अवैध अड्डे सील कर दें तो आधी बीमारी वैसे ही ठीक हो जाएगी।”
सीएमओ पहले ही कह चुके हैं कि अधीक्षक के क्षेत्र में अवैध अस्पतालों पर रोक लगाने की जिम्मेदारी उसकी, नोटिस का जवाब न मिला तो FIR होगी। अब देखना ये है कि नऐ अधीक्षक सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाते हैं या उझानी के ‘झोलाछाप साम्राज्य’ पर सच में हंटर चलाते हैं।
उझानी पूछ रहा है: साहब, स्टेथोस्कोप उठाओगे या फाइलों में उलझ जाओगे? मरीज को दवा नहीं, इंसाफ चाहिए।
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राजेश वार्ष्णेय एमके
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