Jaya Kishori__
मनुष्य का प्रेम अक्सर परिस्थितियों, अपेक्षाओं और स्वार्थ पर आधारित होता है। जब तक हमारी इच्छाएँ पूरी होती रहती हैं, संबंध मधुर लगते हैं। लेकिन जैसे ही अपेक्षाएँ टूटती हैं या परिस्थितियाँ बदलती हैं, वही प्रेम कम या समाप्त भी हो सकता है। इसलिए दुनियावी प्रेम में स्थिरता कम और परिवर्तन अधिक होता है
पर परमात्मा का प्यार अटूट, अनंत और निस्वार्थ है परमात्मा का प्रेम कभी टूटता नहीं, चाहे हम कैसी भी स्थिति में हों
इसका कोई अंत नहीं है, यह हमेशा बना रहता है।
इसमें कोई अपेक्षा नहीं होती — परमात्मा केवल देने वाला है, लेने वाला नहीं

जब इंसान अपने सुख और सुरक्षा के लिए केवल लोगों पर निर्भर रहता है, तो उसे कभी न कभी निराशा मिलती है। लेकिन जब वह परमात्मा के प्रेम से जुड़ता है, तो उसे एक ऐसी स्थिरता, शांति और पूर्णता मिलती है जो बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती
इसका मतलब यह नहीं कि हम दुनिया के रिश्तों को छोड़ दें, बल्कि यह है कि हम अपनी आंतरिक शक्ति और सच्चा सहारा परमात्मा के प्रेम को बनाएं। तब हम रिश्तों में भी अपेक्षा नहीं, बल्कि देने की भावना से जुड़ते हैं — और यही सच्चा, शुद्ध प्रेम बन जाता है
दुनिया का प्रेम बदलता है, इसलिए वह हमें अस्थायी खुशी देता है;
परमात्मा का प्रेम स्थिर है, इसलिए वह हमें स्थायी शांति और संतोष देता है
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