10:09 pm Monday , 20 July 2026
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जीवन में- Jaya Kishori

Jaya Kishori

जीवन में कष्ट या पीड़ा (वेदना) उतनी भारी नहीं होती, जितना कि उस पीड़ा का निरुद्देश्य होना हमें थकाता है। जब हम किसी दुःख से गुजरते हैं और हमें यह समझ नहीं आता कि यह हमारे साथ क्यों हो रहा है, तो वह एक पत्थर के बोझ की तरह हमें दबा देता है। लेकिन जैसे ही उस पीड़ा के पीछे कोई गहरा अर्थ, कोई सीख या कोई महान उद्देश्य जुड़ जाता है, वही पीड़ा हमारी शक्ति बन जाती है
इसे एक पक्षी के उदाहरण से समझा जा सकता है। एक पक्षी के पंखों का भी अपना भार होता है, लेकिन क्योंकि वे उसे उड़ने में मदद करते हैं, इसलिए वह उन्हें बोझ नहीं समझता। ठीक इसी तरह, जब मनुष्य अपने संघर्षों को अपनी प्रगति का माध्यम बना लेता है, तो वे उसे नीचे गिराने के बजाय ऊंचाइयों पर ले जाते हैं
दुःख की मुक्ति का मार्ग उसे मिटाने में नहीं, बल्कि उसे ‘सार्थक’ बनाने में है। जब हम अपने दुःख से कुछ ऐसा सृजन करते हैं जो दूसरों के काम आए या हमारे स्वयं के व्यक्तित्व को निखारे, तब वह दुःख समाप्त हो जाता है क्योंकि उसका उद्देश्य पूरा हो चुका होता है। संक्षेप में कहें तो, कष्ट को सहना मजबूरी हो सकती है, लेकिन उस कष्ट से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ना उसे ‘पंखों’ में बदल देना है

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