Gunjan Agrawal कितना आसान है न समाज के लिए, स्त्रियों के पहनावे को देखकर.. उनके चरित्र का विश्लेषण करना.!! जबकि पुरुषों की कुदृष्टि का, आंकलन करने के लिए.. समाज द्वारा कोई परिमाप ही नहीं बनाया गया है..!!! गुंजन शिशिर/