Jaya Kishori
जब हम सामान्य परिस्थितियों में होते हैं, तो अक्सर हमारे भीतर एक प्रकार का
होती है जो हमें नया सीखने या खुद को बदलने से रोकती है। ऐसे में कई बार समझाने, सलाह देने या किताबों के माध्यम से सीखने की संभावनाएं लगभग खत्म हो जाती हैं क्योंकि व्यक्ति का मन नए विचारों के लिए बंद हो चुका होता है।
लेकिन समय एक ऐसा गुरु है जिसका अनुशासन अत्यंत कठोर और अचूक है। समय जब सिखाने पर आता है, तो वह परिस्थितियों का ऐसा चक्रव्यूह रचता है जहाँ व्यक्ति के पास सीखने के अलावा और कोई विकल्प शेष नहीं बचता। जिन लोगों के बारे में दुनिया यह मान लेती है कि ये कभी नहीं सुधरेंगे या कभी कुछ नहीं समझ पाएंगे, समय उन्हें अपनी ठोकरों और उतार-चढ़ाव से उस मोड़ पर ले आता है जहाँ आत्म-बोध अनिवार्य हो जाता है।
समय की शिक्षा में कोई शब्दावली नहीं होती, बल्कि इसमें अनुभवों की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है। यह उन लोगों की भी वैचारिक जड़ता को तोड़ देता है जो परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक प्रतिरोधी होते हैं। अंततः, यह विचार हमें यह संदेश देता है कि सीखने की प्रक्रिया केवल इच्छाशक्ति पर निर्भर नहीं है; कभी-कभी जीवन की विवशताएँ और समय का प्रवाह सबसे कठिन हृदय वाले व्यक्ति को भी वह सब सिखा देता है जिसे वह अब तक अनदेखा करता आ रहा था
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