🌹आज की प्रेरणादायक कहानी 🌹
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जीवन… जो जी ही नहीं पाए
(लघु ~कथा )
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रामदास के हाथ में बीकॉम की डिग्री थी…
चेहरे पर चमक, आँखों में सपने और दिल में एक ही अहसास —
“अब जिंदगी जीत ली।”
पंद्रह साल की मेहनत आज फल बनकर सामने थी।
घर में मिठाइयाँ बँटीं, पड़ोसियों ने बधाई दी, रिश्तेदारों के फोन आए।
रामदास को लगा — अब सब ठीक है… अब संघर्ष खत्म।
लेकिन जिंदगी ने वहीं से एक नया सवाल खड़ा कर दिया।
एक दिन पिताजी ने सहज स्वर में पूछा—
“बेटा, अब आगे क्या करना है?”
यह सवाल साधारण था…
पर रामदास के भीतर जैसे कुछ टूट गया।
उसे पहली बार एहसास हुआ—
शिक्षा की जंग खत्म हुई है… जीवन की जंग तो अब शुरू होनी है।
काफी संघर्ष के बाद उसे गोटन की एक सीमेंट फैक्ट्री में नौकरी मिल गई।
गाँव से 30 किलोमीटर दूर…
पहले आना-जाना किया, फिर कंपनी ने फ्लैट दे दिया।
जीवन धीरे-धीरे पटरी पर आने लगा।
कुछ ही समय में विवाह हो गया।
और फिर… जीवन के सबसे सुंदर दिन शुरू हुए।
काम से जल्दी घर लौटने की बेचैनी…
पत्नी का इंतजार…
हर रविवार जोधपुर जाना — फिल्म, होटल, घूमना…
और शाम को हाथों में हाथ डाले लौटना।
वो दिन… जैसे जिंदगी मुस्कुरा रही थी।
फिर एक बच्चा हुआ…
फिर बेटी…
और धीरे-धीरे जीवन की दिशा बदल गई।
अब बातचीत में प्यार से ज्यादा जिम्मेदारियाँ थीं…
डॉक्टर, दवाइयाँ, स्कूल, फीस…
त्योहारों पर ही गाँव जाना होता…
बाकी समय कॉलोनी और नौकरी में गुजर जाता।
रामदास ने एक कार भी ले ली…
बैंक में बचत बढ़ने लगी…
सब कुछ “सही” चल रहा था।
बस… जिंदगी कहीं पीछे छूट रही थी।
समय का पहिया घूमता रहा।
बेटा 16 साल का हुआ तो फैसला लिया गया —
उसे कोटा भेजा जाए।
पत्नी बोली—
“मैं भी साथ जाती हूँ… बच्चों का करियर बन जाएगा।”
और वही हुआ।
बच्चे और पत्नी कोटा चले गए…
रामदास गोटन में अकेला रह गया।
अब घर में आवाजें नहीं थीं…
बस टीवी बोलता था… और वो सुनता रहता था।
कभी खुद खाना बना लेता…
कभी मेस से मंगा लेतांज और कई बार…
सुबह की बची रोटी को दूध में भिगोकर खा लेता।
दिन बीतते गए…
और उसके भीतर कुछ सूखता गया।
कोटा के बाद बच्चे जोधपुर चले गए।
रामदास अब रविवार को कभी-कभी मिलने जाता…
बाकी समय… वही खाली कमरा, वही टीवी, वही चुप्पी।
इसी दौरान उसे डायबिटीज हो गई।
क्योंकि…
जब इंसान जीवन से ध्यान हटा लेता है,
तो बीमारियाँ उसका साथ पकड़ लेती हैं।
वो अक्सर उन दिनों को याद करता
जब पत्नी का हाथ पकड़कर शाम को मिल के चक्कर लगाता था…
पार्क में बैठकर बातें करता था…
और मंदिर से शयन आरती कर घर लौटता था।
अब… सब कुछ था, पर कुछ भी नहीं था।
समय बीता…
बेटा विदेश में बस गया…
बेटी की शादी हो गई…
रामदास और उसकी पत्नी…
फिर से साथ थे…
लेकिन अब उम्र 58 की दहलीज पर थी।
बाल सफेद…
चेहरे पर थकान…
और जीवन में दवाइयाँ, चेकअप और चिंताएँ।
रामदास रिटायरमेंट के करीब था…
और एक डर उसे अंदर ही अंदर खा रहा था—
“अब आगे क्या?”
गोटन की शांति उसकी आदत बन चुकी थी…
जोधपुर का घर होते हुए भी, नया माहौल उसे डराता था।
वो अब अक्सर चुप रहने लगा था।
एक दिन पत्नी ने उसका हाथ पकड़ा और कहा—
“चलो जी… फिर से वही दिन जीते हैं…”
आप कहते थे, हमारे रोमांस को नज़र लग गई, अब आपको यह शिकायत कभी नहीं रहेगी…
“इस बार… बच्चों के लिए नहीं… अपने लिए…”
रामदास चुप बैठा रहा।
पत्नी ने उसे झकझोरा—
“चलो ना…”
लेकिन इस बार…
रामदास ने कोई जवाब नहीं दिया।
वो उसके हाथों में ढह गया।
घर में चीख गूँज उठी—
“कोई देखो… इन्हें क्या हो गया?”
पड़ोसी दौड़े…
डॉक्टर आए…
नब्ज़ देखी…
और चुपचाप सिर झुका कर चले गए।
रामदास का सवाल…
जो उसने कुछ समय पहले खुद से पूछा था—
क्या यही जीवन है?
अब… जवाब बन चुका था।
जिंदगी इंतजार नहीं करती…
और जो लोग हमेशा “सही समय” का इंतजार करते रहते हैं,
वो अक्सर जीने से पहले ही चले जाते हैं।
थोड़ा समय अपने लिए भी निकालो…
इससे पहले… बहुत देर हो जाए।
🙏🏻
गूगल से साभार
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