आज की पौराणिक कथा माता ब्रह्मचारिणी
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माता ब्रह्मचारिणी की पौराणिक कथा के अनुसार, माता पार्वती ने पूर्वजन्म में हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारद जी के उपदेश से भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए हजारों वर्षों तक निराहार रहकर कठोर तपस्या की थी। इस भीषण तपस्या (जिसमें उन्होंने सिर्फ बेलपत्र खाए) के कारण उन्हें ‘ब्रह्मचारिणी’ (तपस्या का आचरण करने वाली) कहा गया, जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया।
माता ब्रह्मचारिणी की कथा और महत्व :
कठोर तपस्या : नारद जी की सलाह पर, माता पार्वती ने शिव जी को पाने के लिए अपना घर छोड़ दिया और जंगलों में कठोर तपस्या करने लगीं।
अन्न-जल का त्याग : माता ने सैकड़ों वर्षों तक केवल फल-फूल खाए, और बाद में केवल बेलपत्रों पर जीवन व्यतीत किया। अंत में, उन्होंने वह भी छोड़ दिया, जिसके कारण उन्हें ‘अपर्णा’ भी कहा गया।
अडिग निश्चय : इतनी कठोर तपस्या देख, शिवजी ने उनकी परीक्षा ली, लेकिन माता अपने निश्चय पर अडिग रहीं। अंत में, भगवान शिव प्रसन्न हुए और माता को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया।
पूजा का महत्व : नवरात्रि के दूसरे दिन इनकी पूजा से जीवन में संयम, त्याग, आत्मविश्वास और धैर्य जैसे गुणों का विकास होता है, और कठिन संघर्षों से लड़ने की शक्ति मिलती है।
स्वरूप : माता ब्रह्मचारिणी के दाहिने हाथ में जप की माला और बाएं हाथ में कमंडल है, जो ज्ञान और तपस्या का प्रतीक है।
माता ब्रह्मचारिणी की साधना से जीवन में ज्ञान, तप और सात्विक ऊर्जा की वृद्धि होती है।
गूगल से साभार
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