Chaudhary Sahiba
“अब कहाँ वो लोग मिलेंगे”*
मिले भी तो बस फासलों की दास्तां लेकर,
वो चले गए मेरी खुशियों का जहान लेकर
जिन्हें चाहा था टूट कर, वो पत्थर के निकले,
हम फिरते रहे हाथों में वफ़ा का सामान लेकर।
कभी महफिल की जान थे हम भी ऐ दोस्त,
अब खामोश बैठे हैं लबों पर मुस्कान लेकर।
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