Ravina यं हि न व्यथयन्येते पुरुषं पुरुषर्षभ। समुद:खसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते। :- जो पुरुष सुख तथा दु:ख में विचलित नहीं होता और इन दोनों में समभाव रखता है, वह निश्चित रूप से मुक्ति के योग्य है। ऊँ कृष्णाय नम: । शुभ प्रभात मित्रों।