बदायूं की बात- सुशील धींगडा के साथ
बात उस समय की है जब केद्र और प्रदेश में कांग्रेस की सरकार हुआ करती थी और उस समय एक जनवरी के दिन बदायूं में कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ करता था उस समय बदायूं के एक प्रभावशाली काग्रेसी जनप्रतिनिधि ने कवि निर्भय हाथरसी की कविता इन्द्रा मैया रोटी दे, छोटी दे या मोटी दे, लेकिन हमको रोटी पर कवियों का ेमंच पर ही अभद्र व्यवहार करने के साथ कांग्रेसजनों से पिटवा दिया, बदायूं की साहित्यिक धरा पर इस घटना को लेकर काफी बबाल हुआ था जबकि इस घटना के बाद इस घटना में मुख्य भूमिका का निर्वाह करने वाले राजनेतिक का प्रभाव अर्श से फर्श पर दिखाई दिया और हालात इतने खराब हो गए कि लोकसभा, विधानसभा चुनावों में दूसरों को टिकट दिलवाने वाले नेता जी राजनीति से दूर होकर जनपद से दूर हो गए।
आज इस घटना की याद मुझे इस लिए आई क्योंकि वह नेता जी जनप्रिय राजनेतिक थे और सत्ता में उनकी तूती बोलती थी लेकिन जब उनकी कथनी और करर्नी में फर्क आया तो राजनेतिक महाभारत से वह पूरी तरह दूर हो गए जबकि वर्तमान में राजनेतिक जनता की बात सुुनने की सौगन्ण तो खाते हैं लेकिन जब कुर्सी मिल जाती है तो उनकी कार्यप्रणाली तो खुद को खुदा मान लेने की राह पर चलते हुए दिखाई देने लगते है। आज जिले में बिजली का संकट किसी से छिपा नहीं है लेकिन हमारे पालनहारों को बिजली का दर्द दिखाई नहीं दे रहा है जो सत्ता में हैं वह सत्ता के मद में चूर हैं और जो विपक्ष में हैं वह जनता से पूरी तरह दूर दिख रहे हैं।
कथनी और करनी में दिखने वाला यह फर्क जनता के गले नहीं उतर पा रहा ह ैजिसके चलते जनता एक बार फिर कराहने को मजबूर दिख रही है।
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