8:04 pm Wednesday , 29 July 2026
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प्रभु श्रीराम द्वारा बिभीषण को दिया गया परम उपदेश

🌳 प्रभु श्रीराम द्वारा बिभीषण को दिया गया परम उपदेश! 🌳

जो सत्य एवं धर्म के मार्ग पर चलते है उनके लिए विशेष प्रेरणादायी प्रसंग है अवश्य पढ़ें और इसका अनुसरण करें..

रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥

अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा॥

नाथ न रथ नहि तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥

सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥

राम रावण संग्राम में जब लंकेश रथ पर था और श्री राम जमीन पर नंगे पाँव थे तब बिभीषन बहुत अधीर हो गए और सोचने लगे की महाभट रावण से रघुवीर कैसे लड़ेंगे इनके पास तो न रथ हैं, न तन की रक्षा करने वाला कवच है और न ही पैरो में खडाऊँ। वह बलवान वीर रावण से किस प्रकार युद्ध करेंगे।

प्रेम अधिक होने से उनके मन में सन्देह हो गया और उन्होंने राम से पूछा की प्रभु आप बिना संसाधन के कैसे युद्ध करेंगे। तब श्रीराम ने उन्हें उत्तर दिया जो कि आज के दौर में उतनी ही प्रासंगिक हैं। जो सदैव सत्य एवं धर्म के पथ पर चल के शुद्ध विजय प्राप्त करना चाहते हैं उन्हें यें प्रेरणा देगी।

सौरज धीरज तेहि रथ चाका। जय सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥

बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥

ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना॥

दान परसु बुधि सक्ति प्रचंडा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा॥

अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना॥

कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥

सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें॥

राम जी ने कहा मित्र तुम्हारी चिंता निर्मूल हैं किन्तु मनुष्य जिस रथ से विजय प्राप्त करता हैं वह लकड़ी और लोहे का बना हुआ नहीं होता हैं. वो दुसरा ही रथ होता हैं।

उस रथ के शौर्य और धर्य ही दो पहिये हैं। सत्य और शील (सदाचार) उसकी मजबूत ध्वजा को और पताका है। बल, विवेक, दम (इंद्रियों का वश में होना) और परोपकार- ये चार उसके घोड़े हैं, जो क्षमा, दया और समता रूपी डोरी से रथ में जोड़े हुए हैं।

ईश्वर का भजन ही (उस रथ को चलाने वाला) चतुर सारथी है। वैराग्य ढाल है और संतोष तलवार है। दान फरसा है, बुद्धि प्रचण्ड शक्ति है, वहीं श्रेष्ठ विज्ञान कठिन धनुष है। निर्मल (पाप रहित) और अचल (स्थिर) मन तरकस के समान है। शम (मन का वश में होना), (अहिंसादि) यम और (शौचादि) नियम- ये बहुत से बाण हैं। ब्राह्मणों और गुरु का पूजन अभेद्य कवच है। इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है।

हे मित्र! ऐसा धर्ममय रथ जिसके पास हो वो रावण तो क्या संसार रूपी महान अजेय शत्रु को भी पराजित कर सकता हैं।

प्रभु के वचन सुनकर विभीषण ने हर्षित होकर उन्हें प्रणाम किया और कहा हे प्रभु आप ने कृपा कर के मुझे ये परम उपदेश दिया हैं। जिससे आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन होगा।

गूगल से साभार

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