आजकल लोग सिर्फ पति-पत्नी और बच्चे तक ही सीमित हो रहे हैं। माँ-बाप, भाई-बहन के कोई मायने नहीं हैं।
जब परिवार सीमित हुआ तो संस्कार और व्यक्तित्व भी उतने ही ज्ञात हुए। इसीलिए शायद यूवाओं की सोच उतनी विकसित नहीं हो पा रही है कि पूरे परिवार को समेटने कर रख सकें।
– सुनीता पाण्डेय ‘सुरभि’✍️
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