
Jaya Kishori
प्राचीन ईतिहास और धार्मिक दृष्टिकोण
आज हम सब वास्तु शास्त्र वैदिक ईतिहास पर जाते है तब सौ प्रथम ब्रह्माजी की सृष्टि की रचनाओंका विधायको समजना जरुरी है सनातन धर्ममे आस्था रखने से ए संसार में आदि स्वरूप की सरंचना मे मात्र ए महा विराट ईश्वर ही सॅव शक्ति मान कह सकते हैं ईश्वर की शक्ति बिना किसिसे संभव नही हो सकता अंडे और मरघी एकसाथ पैदा कर सके ईश्वर कृपा का फल है जब संसार की जीव सरंचना मे जरायुज, स्वेदज, अन्डज और उदभिज को पलकोमे पेदा करके फिरसे 84 लाख योनमे विभाजित कर दिया
विस्तार से कहता हु जरायुज का ॳथ होता है गॅभमे रहकर जन्मलेनेवाले जिव जैसे मानव, हाथी, घोडा गाय भेंस, सिह, दानव, पिचाश, ए सब जिवोको जरायुज कहते है ये सब नरमांदाके संसॅगके बाद गॅभमे रहते है फिर जन्म लेते है फिर परिपकव होकर वृध अवस्था मे मृत्यु पामते है
स्वेदज वो है जो पसिने,गंदगी और दुॅगंध से स्वयं पेदा होता है जिसमे माखी मच्छर जु मकोडे , माकंड ईत्यादि
तिसरे प्रकार के जीवको अंडज कहते हैं जिसमें मरधी, बतक, साप, मछली, किडा पक्षी ईत्यादि
उदभिज मे जीव जमीन के अंदर पेदा होता है जिसमे किडा, उंधई, पेड पौधो फुल फल वनस्पति ईत्यादि ये सब जमीन मे स्व्यं पेदा होता है
ब्रह्माजीको आदि सृष्टि की रचना कार मानते है जरायुज मे भी हजारो प्रकार के जीवजंतु पेदा किया है जिसमें मनुष्यों को पंचमहाभूत योनी पंचतत्व के मिश्रणसे बनाया है आकाश, वायु, अग्नि पानी, और पृथ्वी माटी एसे देखने जाते है तो पंच तत्वो पंचमहाभूत जिव एक साथ नही दिखता है लेकिन नष्ट होकर बाद मे आकाश, जल , वायु , अग्नि पृथ्वी मे विलय हो जाता है त्यारबाद माटी होकर धरतीमे समा जाता है
. एक विचित्र सत्य देखा जाय तो जिन सॅजनसे सृष्टि बना ईसलिए के जरायुज, अंडझ,स्वेदज, और उदभिज योनियोमे एक विशेष श्रेणी मे मनुष्यरुपे नर और मादको विकसित किया ईसलिए आज मानवी सॅवश्रेष्ठ विवेकशील कृति है ईस ब्रह्माण्ड ने प्रकृति के नियमनुसार घणाज आध्यात्मिक रुपसे बनाया पंचतत्ववाले मनुष्य शरीर मे चेतन अवचेतन ( दिमाग ) बनाया ईसमे आकाश तत्व के शब्द वाणी , आवाज़ की उत्पत्ति हुआ वाय तत्व से स्पॅश अग्नि से भुख-तरस, पाचन क्रिया और शक्ति उत्पन्न हुआ और पानी से शरीर में लोह, पसिना, विॅय, और रसकी उत्पति हुआ और पृथ्वी से गंध, स्वाद, रुप आकार उत्पन हुआ ये पंचमहाभूत से पांच ज्ञानेन्द्रीयो और पांच कॅमेन्द्रिय, पांच प्राण, मन, बुध्दि, धिरज,अंहकार और अनुराग हुआ जिस मनुष्य ने दुसरे जिवोकी अपेक्षाओने श्रेष्ठ और ईस शरीर को दुॅलभ बनाने मे सफल हुआ है
सृष्टि के आदी चरण में सभी जीवजंतु एक दुसरे के भोज्य पदार्थ है समय जाकर धरती पर वनस्पति, अनाज, फल, फुल, विगेरेको विकास होने से मनुष्य जातिमे संस्कार और संगठन की भावना का विकास हुआ आगे जाकर जैसे जैसे मानव शरीर का आध्यात्मिक पक्षका विकास होने लगा एसे एसे सुष्टीकॅताए उन्हिका माॅगदॅशनकी भाषा, शास्त्र, वेद, पुराण, लिपि, स्वर, और कॅमेन्द्रिय के माध्यमसे आजीविका के साधन उपलब्ध होने लगा मनुस्मृति के अनुसार सभ्य मनुष्य समाजके कही नियमो बनाया जिसमे 16 संस्कार पेदा होने से मृत्यु तक भरणपोषण करना जरूरी है ये देखकर बाद मे धार्मिक क्रियाओं मे परिवर्तन हुआ ए संस्कारोसे वशिभुत होकर 4 प्रकार की वॅण व्यवस्था किया जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र
गीता जैसे अदभुत रहस्यमय शास्त्र मे ईश्वर ने समस्त संसार को खुदका गण स्वरूप कहा गया है जैसे ब्रह्मांड एसेही पींडकी अंदर है त्यारबाद रुषिमूनियो और दैवज्ञों की विशिष्ट योग दष्टिकोण से हमेरेको नक्षत्र, ताराओ, और ग्रहमंडलके बिचका तारण निकालकर एक नया व्यवस्था दी बौद्धिक मनुष्यज नही पण तमाम प्रकार के जीव अंडज हो या स्वदेज, जरायुज, हो के उदभिज खुद को रहने-करने, फालव-फुलवा, विकास करने के लिए एक सुरक्षित स्थान आवास-मकान ईच्छा होती है आज कामके लिए मानवजातिने वास्तु शास्त्र का प्रारंभिक परिकल्पना तरफ ले गये जिससे आरंभिक संकेत हुआ सुॅय सुॅय से पृथ्वी की पुॅव -पश्चिम उत्तर – दक्षिण विगेरे का ज्ञान हुआ
कल का ईसी समय विषय होगा
वैदिक वास्तु का जन्म कब हूआ और कहा कहा उल्लेख
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