Kaveri Gupta
हाथ छूटा या छोड़ा…कोहरा था दिखा नहीं
एक तो नम थी आँखें… उसपे ख़्वाबों का वज़न
गाँठों को जोड़ने में होती हैं घायल उंगलियाँ
हाथ वो भी हैं जलते…जो किया करते हैं हवन
कश्मकश से भरे होते हैं मोहब्बत के रिवाज़
आग बुझ जाती है पर…राख़ में रहती है तपन!
🌺🌹शुभ प्रभात 🌹🌺
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