Mona (संप्रेषण)
एक उलझन
हूँ कहूँ तो स्त्री का जीवन उलझनों का समन्वय है। वो हर समय किसी न किसी रिस्ते से उलझी रहती है। स्त्री न खुलकर हंस सकती है, न रो सकती है, न ही मन की व्यथा ही किसी से साझा कर सकती है।
उलझन की घुटन उस समय और ज्यादा हो जाती है, जब एक अनजान के साथ जीवन की शुरुआत करने की बात होती है। यदि साथी सहयोगी और सकारात्मक हो तो उलझन धीरे धीरे दूर हो जाती है परन्तु नकारात्मक सोच वाले इंसन के साथ जीवन बस समझौता रह जाती है।
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