Ravina Mishra भाले बिजली बनकर कूटे, ढालों पर वज्र प्रहार धरे। विद्युत-वेग सम रण-नर्तन, शौर्य-शिखर पर चरण खरे। सिंह-नाद से पर्वत दहके, शत्रु-दुर्गों के द्वार हरे। अग्नि-श्वास भर सेनाओं में, रण-झंकारित सिंहासन हरे।।