बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
पिछले कई वर्ष से जिले में भाजपा लोकसभा चुनाव के उम्मीदवार चयन में गैरों पे करम, अपनों पे सितम की राह पर चलती दिख रही है। पहले आधे बाहरी, आधे स्थानीय नेताओं को आजमाया उसके बाद स्थानीय लोगों को दूर करके बाहरी नेताओं को मैदान में उतारा लेकिन चार बार के प्रयोग में एक बार आधी – अधूरी सफलता डा संघमित्रा मौर्य के रूप में मिली जो आम आदमी की निगाह में यहां कभी पूर्णतयः भाजपाई नहीं हो पाई। बात बिनावर सीट से पांच बार भाजपा के विधायक रहे राम सेवक सिंह पटेल से शुरू करें तो आज तक कोई भाजपाई यह बात नहीं बता पाया कि बिनावर क्षेत्र में भाजपा का परचम फहाराने के बाद पांच बार के विधायक राम सेवक सिंह पटेल का टिकट किस आधार काटा गया और बिनावर क्षेत्र के परसीमन में समाप्त होने पर लोेकसभा चुनाव में उनकी दावेदारी को नजरंदाज क्यों किया गया और अगर श्री पटेल की दावेदारी इसलिए नजरंदाज की गई कि वह भाजपा से टिकट कटने पर कल्याण सिंह की पार्टी से मैदान में आये थे तो इस बात का क्या जवाब है कि बाबू जी कल्याण सिंह की भाजपा में वापसी के समय राम सेवक सिंह पटेल को किनारे क्यों किया गया। आज जिले में भाजपाई कुछ भी कहें परंतु यह सत्य है कि बदायूं सीट पर रामसेवक सिंह पटेल से मजबूत उम्मीदवार कोई नहीं हो सकता। यह बात सब जानते हैं सब मानते हैं लेकिन पंचों की बात सर माथे परंत राम सेवक सिंह का टिकट की बात नहीं होगी के हालात दिखते हैं।
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