बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
बदायू के पालनहारों की बात पर गौर करें तो ऐसा लगता है कि हमारे पालनहार होने का दावा करने वाले सब कुछ लुटा के होश में आने को तैयार नहीं हैं। सबका साथ सबका विकास कहते तो बहुत हैं लेकिन केंद्र में हमारे पालनहारों की हालत कितनी पतली है जो पालनहार अनुनय, विनय करने के बावजूद बदायूं से दिल्ली और लखनउ की कोई ट्रेन चलवाने के मामले में एक कदम भी आगे नहीं चल सके। बदायूं से तमाम दावों के बाद पालनहार दिल्ली जाते हैं रेल मंत्रालय में सीटी बजाते हैं और अर्जी लगाते हैं और वहां से आश्वासन का ऐसा सीरप लेकर घर वापस जाते हैं और टेªन चलने की अर्जी रेलवे मंत्रालय से बाहर नहीं निकलती। पता नहीं रेल मंत्रालय को बदायूं से कौन सी दुस्मनी है जो शेखूपुर और कछला रेलवे स्टेशन खत्म करने में जितनी सक्रियता दिखाई वह बदायूं से दिल्ली और लखनउ की टेªन चलवाने में नहीं दिखाई देती। लोगों को तो लगने लगा है कि बरेली कासगंज रेल मार्ग पर आमान परिवर्तन और शेखूपुर एवं कछला के रेलवे स्टेशन खत्म किए जाने के समय केन्द्र सरकार के बदायूं से सम्बृद्ध मंत्री का केंद्रीय रेल मंत्रालय में कोई ऐसा खूंटा है जो बदायूं के मामले को पटल तक ही नहीं आने देता और इसी के चलते बदायूं को दिल्ली और लखनउ से जोडने वाली कोई रेलगाडी नहीं मिल पा रही है।


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