Laxmi Singh बचपन जहां गुजरा वहां अब मेहमान कहलाती हूँ, और जहां अब रहती हूं मै वहां का घर संभालती हूं, फिकर दोनों की करती हूं सुखी दोनों ही रहें हरदम, बेटी हूं जनाब दो घर होते हुए भी पराई कहलाती हूं! शुभ संध्या