3:04 am Sunday , 2 August 2026
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सबको देख लिया कई – बार, अब किसको देखे अगली बार ?

बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
आजादी के बाद देश की लोकतांत्रिक प्रणाली में सक्रियता से भाग लेने वाले बदायूं के मतदाता वर्तमान समय अजीब उलझन में फंसे दिख रहे हैं और वह उलझन लगभग सभी राजनेतिक दलों की एक सी देन है जिसके चलते मतदाता आज यह सोचने को मजबूर हो गया कि वह जाए तो जाए कहां और सब एक जैसे तो अपनायें क्या। सबकी थाली एक जैसी तो अब खाये तो खाऐं क्या। देश की आजादी के बाद अब तक के लोकसभा और विधानसभा के चुनाव में बदायूं वालों ने कांग्रेस, जनता पार्टी, बसपा, सपा और भाजपा सब राजनेतिक दलों को अपना सिरमौर चुनका सभी राजनेतिक दलों के उम्मीदवारों को सांसद और विधायक चुना लेकिन सिवाये अपना खोने के कुछ पाने का कोई अवसर मतदाता की उम्मीदों पर खरा उतरने वाला नहीं मिला क्योंकि जो जीता उसने अपने हिसाब से अपना इतिहास बनाया लेकिन जिले के भूगोल से अपने आपको पूरी तरह दूर रखा। परसीमन में क्षेत्र बदले, कछला और शेखूपुर रेलवे स्टेशन से हाल्ट बने, जिले से गुन्नौर अलग हुआ लेकिन बदायूं के किसी राजनेतिक योद्धा ने जनता के दिल की बात को जानने का प्रयास नहीं किया, बस अपने राजनेतिक जीवन पर निगाह रखी। रेलवे का आमान परिवर्तन हुआ फिर बरेली कासगंज रेल मार्ग का विद्युतीकरण भी हो गया लेकिन लम्बी दूरी और दिल्ली और लखनउ की रेलगाडी पकडने के लिए बरेली और कासगंज जाने की मजबूरी आज तक बनी हुई है।
बदायूं के आम आदमी को ऐसा लगता है बदायूं में सारा किस्सा कुर्सी का ही रहा है किसी ने जीतने के बाद जनता की तरफ देखने की जरूरत महसूस नहीं की और जिसने जनता की तरफ देखने की कोशिश की उसके साथ उसके अपनों ने ऐसा खेल खेला कि जनता की तरफ देखने वाले को उसके अपने राजनेतिक दल के हाईकमान ने जिले से दूर करके रख दिया।

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