बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
पिछले वर्षो से बदायूं की राजनीति में ऐसा परिवर्तन दिखाई दिया है जो आजादी के बाद से पिछले दशक तक कभी नहीं देखा गया था पर पिछले दशक में तत्कालीन सत्ताधारी राजनेतिक दल के एक सांसद और मंत्री के बीच ऐसा संग्राम दिखाई दिया जो बदायूं से लेकर सैफई होते हुए दिल्ली और लखनउ तक चर्चा में रहने के साथ अखवारों और न्यूज चैनलों की सुर्खियों का केंद्रविंदु बन गया जिसमें कबडडी की तरह वो मारा, वो देखो के बीच राजनेतिक ब्यानबाजी होती रहीं लेकिन परिणाम कभी कुछ नहीं दिखा क्योंकि कभी दोनों पक्षों में दोस्ती हो जाती तो कभी तलवारें खिचती दिखाई देती जिसका परिणाम तत्कालीन सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं को सहन करना पडा और सर्वविदित है कि अपने ही राजनेतिक किले में उनकी साइकिल सत्ता के दरवाजे तक नहीं पहुंच सकी।
अब वर्तमान में वहीं हालात फिर दिखाई दे रहे हैं बस फर्क झंडे के रंग का फर्क हुआ है और संघर्ष की केंद्रविंदु भाजपा के कब्जे वाली जिला पचायत बन रही है। बीते दिवस फूल वालों की राह में ऐसे कांटे बोने का काम दिखाई दिया जिसकी समर्पित कार्यकर्ताओं का संगठन कहा जाता है और इसी के बल में उपरोक्त राजनेतिक दल ने प्रदेश और केंद्र की सत्ता तक पहुंचने का काम करने के साथ देश को विश्व में प्रमुख पहचान दिलाने जैसा काम करके विरेाधियों का मुंह बद करने जैसा वह काम कर दिखाया है जो पूर्व के समय में कभी सम्भव नहीं दिखाई देता था।
सत्ताधारी दल के कार्यकर्ताओं और जिला पंचायत अध्यक्ष की आपसी जंग में कोई परिणाम आएगा अथवा नहीं इसका जवाब तो गुटबाजी की चिंगारी को हवा देने वालों को पता होगा लेकिन आम आदमी को लग रहा है गुटबाजी के दो पाटों की चक्की में एक बार फिर नगर पालिका एवं नगर पंचायत चुनाव की तरह एक बार फिर उलझनों का सामना राजनेतिक दल को ना भुगतना पडे।
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