Ravina Mishra उसके ऑंगन में खुलता था शहरे मुराद का दरवाजा कुएं के पास खाली गागर हांथ में लेकर पलटी मैं एक मुठ्ठी तारीकी में थी एक मुठ्ठी में बढ़कर प्यार लम्स के जुगनू जेब में रखके जीना जीना उतरी मैं।