Ravina Mishra
कोई पहलू निकालता क्यूँ है
बात बातों में टालता क्यूँ है
अपने पिंजरे में याद के पंक्षी
तोता मैना को पालता क्यूँ है
भर गया जख्म फिर सीने में
दर्द रह रहकर सालता क्यूँ है
टूट जाते हैं कच्ची मिट्टी के
इन खिलौने को ढालता क्यूँ है
बूंद भर मय नहीं बची तल में
फिर प्याला खंगालता क्यूँ है।
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