Ravina Mishra
अभेद्य अंधेरे के पार
मैं तुम्हारी प्रतिक्षा करती हूँ
सिर्फ यह कहने, कि
मैं तुमसे करती हूँ प्रेम
आत्मा का कोई कोना
बचा रखी हूँ अभी भी
स्पंदित होता हुआ
आधी सदी के लिए
और,,,, यह की
तुम्हें लिखी हुई मेरी कविता
एकाकीपन के गर्भ से नहीं
अपितु कैशोर्य के उन्माद से
प्रस्तुत हुई है,,,,।
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