बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
जनपद की राजनीति में उन चेहरों की चर्चा करें जो अपने संगठन के प्रति समर्पित होकर जीवन व्यतीत किया तो सपा, बसपा, कांग्रेस और भाजपा के अलावा लोकदल, संसोपा, प्रसोपा, जनसंघ, दमकिपा तथा परिवर्तन दल में तमाम चेहरे ऐसे चेहरे सामने आ जाएगें जिन्होंने पूरा जीवन सादा जीवन उच्च विचार की राह पर गुजार दिया और अंत तक ऐसे लोगों के हिस्से में दरी बिछाना, सभाऐं कराना और संगठन को मजबूत बनाने में पूरा जीवन लगा दिया लेकिन जब संगठन के प्रभाव का लाभ लेने का समय आया तो संगठन के पदाधिकारियों ने उनको दोयम ही नहीं तृतीय और चतुर्थ श्रेणी का कार्यकर्ता घोषित कर दूर रहने की नसीहत देकर चुप रहने को कह दिया क्योंकि संगठन के लोग जानते थे कि समर्पित कार्यकर्ता कुछ भी कह लो कहीं नहीं जाएगें और उनके साथ रहेगे तो ना खुद खाएगें ना खाने देगें। आज दर्जनों नहीं सैकडों समर्पित कार्यकर्ता संगठन के प्रति समर्पित होने की सजा एकांत जीवन में काट रहे हैं और मौका परस्त मलाई खाने के साथ रसमलाई में डुबकी लगा रहे हैं क्योंकि उन्होंने उनको गले लगा रखा है जो खुद खाते हैं और आका का हिस्सा उसके घर पहुंचाते है और यही उनके जीवन का सार और तरक्की का आधार बना हुआ है।
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