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संसार को सद्मार्ग पर ले जाने का काम किया है गोस्वामी तुलसीदास जी ने आचार्य राजेश कुमार शर्मा

संसार को सद्मार्ग पर ले जाने का काम किया है गोस्वामी तुलसीदास जी ने आचार्य राजेश कुमार शर्मा

महाकवि भक्त तुलसीदास जयंती के अवसर पर
इस धरती पर कतिपय ऐसी महान विभूतियां आई हैं , जिनका अवतरण (जन्म) एवं निर्वाण (मृत्यु) एक ही तिथि को हुआ है। उन विभूतियां में भक्ति-कुल-शिरोमणि तुलसीदास जी अन्यतम हैं। उनका जन्म तथा देहावसान – दोनों ही श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को हुआ था।

तुलसीदास जी के जन्म पर यह दोहा प्रचलित है –
पन्द्रह से चौवन विषै , कालिंदी के तीर।
सावन सुक्ल सप्तमी, तुलसी धरेउ शरीर।।
अर्थात् १५५४ विक्रम संवत् में यमुना नदी के किनारे श्रावण शुक्ल सप्तमी को तुलसीदास जी ने जन्म ग्रहण किया था।
उनके देहावसान पर यह दोहा प्रसिद्ध है –
संबत सोलह से असी , असी गंग के तीर।
श्रावण शुक्ला सप्तमी , तुलसी तजै शरीर।।
अर्थात संवत् १६८० में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को गंगा नदी के तट पर स्थित असी घाट पर गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपन शरीर का परित्याग कर दिया।

तुलसीदास जी का अद्भुत जीवन
जन्म के समय तुलसीदास रोए नहीं, बल्कि उनके मुख से ” राम ” शब्द उच्चरित हुआ। उनके जन्म की चौथे दिन ही माता ‘ हुलसी ‘ का देहावसान हो गया। जब तुलसीदास जी साढ़े पांच वर्ष के थे , तब उनका पालन-पोषण करनेवाली ‘ चुनिया ‘ का भी देहान्त हो गया। एक तरह से तुलसीदास अनाथ हो गए।

तभी श्री नरहर्यानंद जी की दृष्टि तुलसीदास पर पड़ी। उन्होंने इस बालक का नाम ” राम बोला ” रखा। उन्होंने ही इन्हें ” राम मंत्र ” की दीक्षा दी। तुलसीदास जी ने काशी में पन्द्रह वर्ष तक रहकर वेद-वेदाङ्ग , रामायण , महाभारत आदि का गंभीर अध्ययन किया।

उनतीस वर्ष की आयु में सुन्दर नवयुवती ” रत्नावली ” के साथ उनका विवाह हुआ।
अपनी अर्धांगिनी रत्नावली के प्रति तुलसीदास जी में अत्यधिक आसक्ति थी। इसे देखकर रत्नावली ने कहा – ” मेरी इस हाड़-मांस के शरीर में जितनी तुम्हारी आसक्ति है , उससे आधी भी यदि भगवान में होती , तो तुम्हारा बेड़ा पार हो गया होता ! ” यह बात तुलसीदास को चुभी। तुरंत वह घर छोड़कर निकल पड़े। प्रयाग आकर उन्होंने गृहस्थ वेश का परित्याग कर साधु-वेश ग्रहण किया।

धन्य हैं रत्नावली देवी! जिन्होंने तुलसीदास जी को ” काम ” से ” राम ” की ओर मोड़ दिया अर्थात् माया में बंधे तुलसीदास को मायापति श्रीराम की ओर उन्मुख कर दिया।

भक्त तुलसीदास जी ने ७७ (सतहत्तर) वर्ष की आयु में संवत १६३१ में रामनवमी के दिन अयोध्या में रामचरितमानस की रचना प्रारंभ की थी। तुलसीदास जी स्वयं रामचरितमानस में लिखते हैं –
संवत सोलह सै एकतीसा।
करउं कथा हरि पद धरि सीसा।।
अर्थ – श्री हरि के चरणों पर मस्तक रखकर संवत् १६३१ में इस कथा (रामकथा याने श्री रामचरितमानस) का आरंभ करता हूं।
महाकाव्य रामचरितमानस के सातों काण्ड की समाप्ति दो वर्ष सात महीने छब्बीस दिन में संवत् १६३३ के मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष में राम-विवाह के दिन हुई थी।

सतहत्तर वर्ष की आयु में प्रभु के प्रति लेखन-कार्य का शुभारंभ करके उन्होंने हम सभी को यह प्रेरणा दी है कि साठ वर्ष के बाद हम भी प्रभु का कोई-न-कोई कार्य प्रारंभ कर उसे पूर्ण भी कर सकते हैं। तुलसीदास जी से यही प्रेरणा लेकर मैं भी मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम एवं लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण का आधार लेकर प्रभु के यशगान को फेशबुक के माध्यम से चतुर्दिक फैलाने का प्रयास कर रहा हूं।

महाकाव्य श्री रामचरितमानस की रचना के कारण भक्त कवि तुलसीदास जी की गणना विश्व के प्रसिद्ध महाकवियों में होती है। महाकाव्य श्री रामचरितमानस को विश्व के १०० सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय काव्यों में ४६ वां स्थान प्राप्त हुआ है। यह हम सभी के लिए गर्व की बात है। तुलसीदास जी की अन्य काव्य रचनाएं – विनय पत्रिका , कवितावली , दोहावली , हनुमान चालीसा भी लोकप्रिय हैं।
आचार्य राजेश कुमार शर्मा की ओर से आपको गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती पर हार्दिक शुभकामनाएं।

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