बदायूं की बात- सुशील धींगडा के साथ
बदायूं को कभी समाजवादी पार्टी का किला कहा जाता था लेकिन भाजपा की मोदी लहर में किला तार – तार हो गया और मजेदार बात यह थी कि बदायूं जिले में सपा की इस बदहाली की हालत की जिम्मेदार सपा विरोधी नहीं स्वयं सपा के पालनहार थे और आज यही हालत जिले में भाजपा की है जिसके पालनहार लोकसभा चुनाव में सब कुछ होते हुए बदायू और आंवला दोनों संसदीय सीटों पर पराजय देखने को मजबूर हो गए और इस पराजय के जिम्मेदार भाजपा विरोधी नहीं स्वयं भाजपा के वह अपने पालनहार जिम्मेदार रहे जो प्रदेश और देश में अपनी सरकार होते हुए बरेली कासगंज रेलमार्ग पर लम्बी दूरी की कोई नियमित ट्रेन तो क्या प्रदेश और देश की राजधानी को जोडने वाली भी कोई ट्रेन नहीं दिलवा पाये। इस बात का दुख भाजपाईयों से ज्यादा उस आम आदमी को है जो भाजपा शासन में सबका साथ – सबका विकास की ओर देख रहे थे जबकि भाजपाईयों की रेल के प्रति लापरवाही और सही उम्मीदवार का चयन ना किए जाने से बदायूं और आंवला संसदीय सीट पर भाजपा उम्मीदवार पराजित हो गए। जिले की दो – दो सीटों पर भाजपा की पराजय के बावजूद रेलगाडियों की तरफ कोई नहीं देख रहा और लगता यह है कि रेलगाडियों की जरूरत को अनदेखा करने का परिणाम आने वाले विधानसभा चनावों में जिले में एक बडी पराजय देखने की राह बना सकता है। प्रदेश और केंद्र की सरकार भले कोई दावा करती रहे और भाजपा के पालनहारों को सत्ता में डूबने के उपरांत हर तरफ हरा ही हरा दिख रहा हो लेकिन भाजपा के पालनहार जिले में इस बात को पूरी तरह भूल से गए हैं कि भाजपा की जीत को हरा नहीं भगवा रंग की जरूरत है।
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