सत्य की आग में जल करके,
हर अग्नि परीक्षा देता हूं।
मैं कल भी तप कर सोना था,
मेरी कीमत तो आज भी है ।
कोई क्या कहता फर्क नहीं,
मैं मस्त परिंदा हूं नभ का ।
मैं खुद का साथी कल भी था,
मेरी यह आदत आज भी है ।
झुकता हूं बस उसके आगे,
जो कण-कण-में बसता है यहां।
डर के जीता मैं कल भी ना था,
मेरी यह फितरत आज भी है ।
मैं कल भी तप कर सोना था,
मेरी कीमत तो आज भी है ।
प्रियंका विवेक सिंह
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