बदायूं की बात – सुशील धींगडा के साथ
किसी को याद करना और किसी को कुछ ना मानना हर व्यक्ति की अपनी मर्जी है लेकिन समाजिक और राजनेतिक संगठनों को इस बात पर गहनता से विचार करना चाहिए कि उनकी कार्यप्रणाली क्या होना चाहिए। राजनेतिक दलों का आम आदमी से सीधा जुडाव होना चाहिए कि देश की आजादी के लिए अपने प्राणों का बलिदान देने वालों के प्रति उनकी कार्यप्रणाली क्या होना चाहिए क्योंकि पिछले कई वर्षो से जातिगत समाज की राजनीति करने हेतु चर्चित कुछ राजनेतिक दलों की स्थानीय संगठन देश के लिए प्राणों का बलिदान करने वाले शहीदों के जन्मदिवस और बलिदान दिवस से दूरी बनाकर बनाकर दिखाई दे रहे हैं। उन राजनेतिक दलों के स्थानीय पदाधिकारियों को इस बात पर गहनता से विचार करना होगा कि अंग्रेजों से आजादी दिलाने वालों का काई धर्म और जाति नहीं थी उन्होनें देश के ेलिए बलिदान दिया और देश को आजादी मिलने के बाद समाज को मौलिक अधिकार मिले, साइकिल चलाने अथवा हाथी घुमाने से समाज अपने साथ कैसे जोडकर रखेगें। आज आजादी के दीवाने शहीद भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू का बलिदान दिवस है साइकिल पर सवारीशान से करो चाहे हाथी पर गुमान से घूमों परंतु आजादी के दीवानों के बलिदान को नजरंदाज करने से समाज का कितना नुकसान होगा इस बात पर विचार करना चाहिए क्योंकि शहीदों का सम्मान करने से ना तो समाजवादियों की साइकिल पंचर हो जाएगी और ना ही बसपा का हाथी जंगल में भाग जाएगा।
badaunexpress.com badaunexpress.com | www.badaunexpress.com